श्री बाबा मोहनराम आश्रम कृष्णतीर्थ,

उत्तरप्रदेश - भारत

बाबा मोहन राम की उपासना

Upasana Shree Baba Mohan Ram

ॐ गणेशाम्बिकाभ्यां नमः|

हरे कृष्ण! भक्तवत्सल गोपाल! सबके चित्त को मोने वाले मोहन! हरे राम! परब्रहम श्रीराम! सर्व मनोकामना पूर्ण करने वाले बाबा मोहनराम! सबको शरण देने वाले भगवान विष्णु! मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप नीले अश्व पर सवार हैं । आपने साधु रूपधारण किया है। गले में वैजयन्तीमाला धारण किये हो । आप मोर मुकुट पहने हुए हो, कान में कुण्डल धारण किय हो । हाथ में तलवार लिये हो । आपने कलियुग में अवतार लिया है ।

मैं आपको नमस्कार करता हूँ। बाबामोहनराम काआवाहन:-जिनके चरणएवं हाथ कमल के समान सुन्दर हैं, मुख कमल अत्यन्त ही शोभायमान है, जो नीले अश्व की पीठ पर विराजमान है, उन श्री बाबामोनराम भगवानको मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ। बाबा मोहन राम का स्त्रोत:- हे बाबा मोहन राम!आपकी जय हो । हे महामते! इन्द्रादि देवताओं द्वारा वन्दित दिव्य आभूषण धारण करने वाले! हे सन्तों, भक्तों के उपकारक! हे प्रभु! आपके देव दुर्लभ श्री चरण कमलो में हमारा ध्यान लगा रहे । हम सदैव आपकी भक्ति करते रहें, यही हमारी आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है।।1।।

हे परब्रह्म साधुओं के हृदय में स्थित प्रभु! संसार की श्रेष्ठ रूप सम्पत्ति से रचित आपका शरीर (रूप) कामदेव के मन को भी मोहित करने वाला है। आप हमारी मनोकामनाओं को पूर्ण करें । आपका यश संसार के शोक का नाश करने वाला है। आपका चन्द्र बन अमृतमय मीठी वाणी की वर्षा कर सबको प्रसन्न करता है।।2।।

हे प्रभो आपकी मन्द मधुर मुस्कान अमृतमयी धारा बहती है। हे भगवन आपका कमल बदनसंसार कामंगल करे ।।3।।

हे कृपा सागर परमेश्वर हमसे जो अपराध हो गये हों, उनको क्षमा प्रदान करें । हमें अपनादास्यबनालो ।।4।।

आपकी प्रकृति महत्व, अहंकार तत्व और पंचतन्मात्राओं आदि से शरीर का निर्माण करती है। हे प्रभो आपकी लीलासे ही इस ब्रह्म कल्पित संसार में सृष्टि सिथत पालन एवं प्रलय होती है।।5।।

हे देव! आप पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश ये पंचभूत देह और इन्द्रियों के आश्रय हैं । हे प्रभु! इन पंचभूत और अपनी त्रिगुणमयी माया से बचाकर अपने भक्तों पर कृपा करो । हे नि:कलंक ! आपके नाम, गुण, कीर्तन से कलिकाल के पाप समूहदूर हो जाते हैं,आपअनन्त गुणों के भन्डार है। हेभव,भय,भंजन,संसार में जो लोगआपके पवित्र नाम को जपते है,वह जन्मबन्धन से मुक्त हो जाते हैं ।।6।।

हे देवपालक! आपके अवतार से सन्तों का मान बढ़ता है, भक्तों की लक्ष्मी बढ़ती है । देवों का पालन होता है, सतयुग को पुनः अधिकार प्राप्त होता है। धर्म की वृद्धि होती है और कठोर कलिकुल का संहार होता है। इस समय आपके इस अवतार से हमारामंगलहो ।।7।।

हे प्रभु हमारे घर में पति, पुत्र, पौत्र, रथ, ध्वज, चंवर, ऐश्वर्य एवं मणिमय आसन आदि सभी कुछ आपके आशीर्वाद से विद्यमान है। हम आपके चरण कमलों की पूजा करते हैं।।8।।

हे जगत्पते ! आप मन्द -मन्द मधुर मुस्कान से शोभायमान, सर्वाग सुन्दर,मनोहर अमृतमयी वाणी से विभूषित,रमणीक चेष्टा सम्पन्न आपका यहमुख कमल हमारे प्रियकार्य करे ।।१।।

आप सबको अभयदान करते हुए नीले अश्व पर आरूढ़ हो विचरण करते हो। हे देव आपकी खड्ग प्रवाह से बहुत से मलेच्छों का विनाश होगा तथा धर्म की स्थापना होगी । भक्तों की आपरक्षा करेंगें । आपके रसीले सजीले मुखमण्डल पर शत शत चन्द्रमाओं की कान्ति विराजमान है। महादेवव ब्रह्मा जी भी आपसे आश्रय चाहते हैं । हे देव आप निःसन्देह सनातन पूर्ण ब्रह्म हो। आपकी जयहो । हम आपको बारम्बार नमस्कार करते हैं ।।10।।

जो व्यक्ति बाबा मोहन राम जी के इस स्त्रोत का पाठ करेंगें, उनके घर में स्थिर लक्ष्मी का वास तथा धर्म,अर्थ और काम को पूर्ण करने वाला गृहस्थ आश्रम सदैव खुशहाल रहता है तथा उसका परिवार पति, पत्नी, लक्ष्मी, ऐश्वर्यशाली तथा पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न रहता हैएवमगृहस्थ आश्रम कभी भी नष्ट नहीं होता। (11)


1. img माता शक्ति
2. img विष्णु भगवान
3. img सूर्य भगवान
4.
5.
आप स्वयं गणेश, विष्णु, शिव, सूर्य और शक्ति हो । वस्तुतः आप एक ही हैं । लीलाके अनुसार विभिन्न नामधारण करके पांच रूपों में आपप्रकट हैं । मेरा आपको बारम्बार नमस्कार है। समस्त दुःखों को दूर करने वाले देवेश्वर!आपकी जयहो। भक्तों को शरण देने वाले पुरुषोत्तम! लक्ष्मीपते! आपकी जयहो । समस्त तीर्थों में स्नान करने से तथा सब प्रकार के यज्ञों द्वारा भगवान का पूजन करने से जो अद्भुत पुण्य होता है, वह आपके चरणामृत की एक-एक बूंद से प्राप्त होता है। आपको नमस्कार है। यदि किसी के कान में अकस्मात् आपका नाम पड़ जाता है। उसके सारे पाप उसी प्रकार भस्म हो जाते हैं । जैसे आगकी चिंगारीरुई को भस्म करदेती है।
हे बाबा मोहन राम! मुझसे प्रतिदिन हजारों अपराध होते रहते हैं, किन्तु मैं आपका ही सेवक हूँ, उसके लिए मुझे क्षमा करें । आपको नमस्कार है। हे श्री वत्स चिन्ह को वक्षःस्थल पर धारण करने वाले आपको नमस्कार हैं । हे अनन्त आनन्द के समुद्र गोविन्द आपको नमस्कार है। ब्रह्मा, शिव और इन्द्र आदिदेवताआपकी स्तुति करते हैं। आपको नमस्कार है। आप विष्णु, वासुदेव,सनातन परमात्मा, परब्रह्म, परमज्योति,परात्पद, अच्युत, पुरुष, कृष्ण,शाश्वत्, शिव, ईश्वर, नित्य, सर्वगत,स्थाणु, रूद्र, साक्षी, प्रजापति, यज्ञ साक्षात, यज्ञपति, ब्राह्मणस्पति, हिरण्यगर्भ,सविता, लोककर्ता लोकपालक और विभु आदि नामों से जाने जाने वाले को नमस्कार है। लक्ष्मी से सम्पन्न आप लीला के स्वामी और सबके प्रभु हैं । आपको नमस्कार है।
आप अम्त्व के स्वामी है। आप श्रीपति है। आपका दिव्यरूप बड़ा मनमोहक है, मनोहर है। भक्जन आपकी प्रेम से भक्ति करते हैं। अतः आपका नाम मोहन है। योगीजन आप में रमण करते हैं । इसलिए आपका नाम राम है। इसलिए हे प्रभु! कलियुग में आप भक्तों के सभी मनोरथ पूरे करते है। अतः भक्तजन आपका बाबा मोहनराम केनाम से ध्यान, स्मरण, आवाहन तथा पूजा करते हैं । आपके चरणों में बारम्बार प्रणाम है।
इस स्तुति को सुनकर बाबा मोहनराम आप प्रसन्न हो । मेरी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले एवं फल प्रदान करने वाले हों । हे पद्यनाथ आपको नमस्कार है। श्याम रंग वाले को नमस्कार है। सभी प्रकार की अभीष्ट अभिलाषा पूर्ण करने वाले परमब्रह्म,ॐ श्री, अलख, अखण्ड, निरंजन,निराकार नारायणज्योतिस्वरूपंबाबामोहरामको नमस्कार है।।विश्वास करो कि भगवान् बाबा मोहनराम असम्भव को सम्भव करते हैं । भक्तों की प्रतिकूल स्थिति को तुरन्त बाबा अनुकूल करते हैं । मैं उनकी कृपा पर निर्भर हूँ। वे मेरा परम कल्याण निश्चय ही करेंगे । उनकी कृपा से अनुकूलता के सारे साधनसुन्दरतासे जुट जाते हैं।
इस स्तुति को सुनकर बाबा मोहन राम ने आशीर्वाद दिया कि जो इस स्तुतिको सुनेगा।अथवा पढ़ेगा, उसकीसमस्त मनोकामनाएं पूर्ण होगी।

दीपो ज्योतिः परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः ।
दीपो हरतु मे पापं ज्योति स्वरूपम निराकार
नारायण परब्रह्म मोहनरामाये नमोऽस्तु ते ।।
शुभं करोतु कल्याणमारोग्यं सुखसम्पदम् ।
शत्रुबुद्धिविनाशं च दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते।।

किसी भी देवशक्ति का सानिध्य प्राप्त करने के लिये अखण्ड ज्योति की स्थापना करना सनातन धर्म की नीति है। ज्योति को परमब्रह्म स्वरूप मानते हैं । निराकार अखण्ड ज्योति स्वरूपम नारायण बाबा मोहनराम परमब्रहा की निम्न मंत्रों द्वारा उपासना की जाती है।
बाबा मोहन राम मन्त्र स्तुतिः-
1. गोपी जन वल्लभचरणान् शरणं प्रपधे ।।
2. ॐ नमो गोपीजन वल्लभभ्याम ।।
3. हरे पार्वती, हरे लक्ष्मी, हरे सीता, हरे राधा । हरे शिव, हरे विष्णु,हरे राम, हरे कृष्ण ।।
4. हरे कृष्ण, हरे कृष्ण भक्त वत्सल गोपते ।। शरणय भगवान विष्णु मा पाहि बहुसंसृते ।।
5. 'जटाधर' पाण्डुरंगं खडगहस्तं कृपानिधिम् । सर्वरोग हरं सर्वसिद्धि विद्या दानं सर्वकार्यसिद्धि विद्या दानं सर्वकार्यसिद्धि मनो वांछित फलं देवं बाबा मोहनराम मम अहं भजे ।।
6. दिगम्बरा दिगम्बरा श्री पादवल्लभ दिगम्बरा ।।
7. बाबा मोहनराम गायत्री-ॐ द्वारकानाथाय विदमहे नील अश्वरूढाय धीमहि तन्नो बाबा मोहनराम प्रयोदयात ।।
8. ॐ गुरू देवाय नमः ।।
9. ॐ श्री बाबा मोहनरामाय नमः ।।
10. ॐ श्री अलख अखण्ड निरंजन रिराकार नारायण ज्योतिस्वरूपम बाबा मोनरामदेवाय नमः ।।
11. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ।।
12. ॐ श्री राधाकृष्णाभ्याम नमः ।।

श्री अमर प्रभु परम पिता परमात्मा बाबा मोहनराम की लीला अपरमपार है। वे अपने भक्तों पर विपत्ति पड़ने पर उसका निवारण करते हैं, चाहे व किसी भी रूप में हों। __ मैंने दूसरों की ओर ताकना, दूसरों पर आस्था रखना बन्द कर दिया और बाबा मोहनराम का हो गया जैसा कि कविने कहा है
एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास । एक रामघन स्याम हित चातक तुलसीदास ।।


1.सतयुग में अश्वनी कुमारों ने महर्षि च्वयन जी को निरोग किया था। तथा महर्षि च्यवन जी ने दोनों अश्विनी कुमारों को द्वितीया के दिन देवत्व तथा यज्ञ-भाग दिलवाया । तब से द्वितीया को सभी कार्य के लिये प्रशस्त माना जाता है। इसमें किसी प्रकार के ज्योतिष आदिदेखने की कोई आवश्यकता नहीं है। अब आपइस द्वितीया तिथि व्रतका विधानसुनें :-
शतानीक बोले-जो पुरुष उत्तम रूप की इच्छा करे वह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया से ब्रत को आरम्भ करे और वर्ष पर्यन्त संयमित होकर पुष्प-भोजनकरे । जो उत्तम हविष्य-पुष्प उस ऋतु में हों उनका आहार करे । इस प्रकार एक वर्ष व्रत कर सोने-चांदी के पुष्प बनाकर अथवा कमलपुष्पों को ब्राह्मणों को देकर व्रत सम्पन्न करे । इससे अश्विनी कुमार संतुष्ट होकर उत्तम रूप प्रदान करते हैं ।
व्रती उत्तम विमानों में बैठकर स्वर्ग में जाकर कल्पपर्यन्त विविध सुखों का उपभोग करता है। फिर मर्त्यलोक में जन्म लेकर वेद-वेदांगों का ज्ञाता, महादानी, आधि-व्याधियों से रहित, पुत्र-पौत्रों से युक्त, उत्तम पत्नी वाला ब्राह्मण होता है अथवा मध्यदेश के उत्तम नगर में राजा होता है।

2.दौज(द्वितीया) व्रतकथा-द्वितीया(अशून्यशयन-व्रत)-राजाशतानीकने कहा-मुने! कृपाकर आप द्वितीया का विधान कहें, जिसके करने से स्त्री विधवा नहीं होतीऔर पति-पत्नीकापरस्परवियोगभीनहीं होता। सुमन्तु मुनि ने कहा-राजन्! मैं द्वितीया का विधान कहता हूँ,इसी का नाम अशून्याशयन-द्वितीया श्री है। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से स्त्री विधवा नहीं होती और स्त्री-पुरुष का परस्पर वियोग भी नहीं होता। क्षीरसागर में लक्ष्मी के साथ भगवान् विष्णु के शयन करने के समय यह व्रत होता है। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया से यह व्रत होता है। द्वितीया के दिन लक्ष्मी की स्तुति इसप्रकार करें:
श्री-पीठ पर स्थित और देवताओं से पूजित होने वाली महामाये तुम्हें नमस्कार है। हाथ में शंख और चक्र धारण करने वाली तुम्हें प्रणाम है । गरुड़ पर आरूढ़ हो कोलापुर को भयभीत कर देने वाली और समस्त पापों को हरने वाली भगवती महालक्ष्मी तुम्हें प्रणाम। सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली, और सबके दुःखों को दूर करने वाली हे देवि!महालक्ष्मी तुम्हें नमस्कार है।
सिद्धि ,बुद्धि,भोग और मोक्षदेने वाली है,मन्त्रपूतभगवती महालक्ष्मी !तुम्हें सदा प्रणाम। हेदेवि! हे आदि अन्त रहित, आदि शक्त ! हे महेश्वरी ! हे योग से प्रकट हुई भगवती महालक्ष्मी ! तुम्हें नमस्कार है।
हे देवि तुम सूक्ष्म और महारौद्ररूपिणी हो, महाशक्ति हो, महोदराहो और बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली हो । देवि महालक्ष्मी ! तुम्हें नमस्कार ! हे कमल के आसन पर विराजमान परब्रह्मस्वरूपिणीदेवि!हे परमेश्वरी!हेजगदम्बे !हेमहालक्ष्मी! तुम्हें मेरा प्रणाम है ।
हे देवि तुम श्वेत वस्त्र धारण करने वाली और नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषिता हो । सम्पूर्ण जगत में व्याप्त एवं अखिल योग को जन्म देने वाली हो । हे महालक्ष्मी तुम्हें मेरा प्रणाम है।
जिसके हृदय में असीम दया भरी हुई है, जो समस्त कामनाओं को पूर्ण कर देती है। तथा अपने कटाक्ष मात्र से सारे जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करती है, उस जगन्माता महालक्ष्मी की जय हो ! जिस शक्ति के सहारे उसी के आदेश के अनुसार परमेष्ठी ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, भगवान् अच्युत जगत् का पालन करते हैं तथा भगवान् रूद्र अखिल विश्व का संहार करते हैं, उस सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति से सम्पन्न भगवती पराशक्ति का मैं भजन करता हूँ।
कमले! योगिजन तुम्हारे चरण कमलों का चिन्तन करते हैं । कमलालये ! तुम अपनी स्वाभाविक सत्ता से ही हमारे समस्त इन्द्रियगोचर विषयों को जानती हो। तुम्ही कल्पनाओं के समूहको तथा उसकासंकल्पकरने वाले मन को उत्पन्न करती हो । इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति -ये सब तुम्हारे ही रूप हैं । तुम परासंवित् (परम ज्ञान) -रूपिणी हो ।
तुम्हारा स्वरूप निष्कपट, निर्मल, नित्य, निराकार, निरंजन, अन्तरहित आतंकशून्य, आलम्बहीन तथा निरामय है । देवि! तुम्हारी महिमा का वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है । जो षट्चक्रों का भेदन करके अन्तःकरण के बारह स्थानों में विहार करती है। अनाहत ध्वनि, बिन्दु, नाद और कला-ये जिसके स्वरूप हैं, उस माता महालक्ष्मी को मैं प्रणाम करता हूँ । माता ! तुम अपने (मुखरूपी) पूर्णचन्द्रमा से प्रकट होने वालीअमृत-राशि को बहाया करती हो । तुम्हीं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी नामक वाणी हो ।
मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ । देवि! तुम जगत् की रक्षा के लिए अनेक रूप धारण किया करती हो । अम्बिके !तुम्ही ब्राह्मी ,वैष्णवी तथा माहेश्वरीशक्ति हो । वाराही, महालक्ष्मीनारसिंही,ऐन्द्री, कौमारी, चण्डिका, जगत को पवित्र करने वाली लक्ष्मी, जगन्माता सावित्री, चन्द्रकला तथा रोहिणी भी तुम्ही हो । परमेश्वरि ! तुम भक्तों का मनोरथ पूर्ण करने के लिये कल्पलता के समान हो । मुझ पर प्रसन्न हो जाओ। इस प्रकार स्तुति करने पर भगवती अपना साक्षात् स्वरूप धारण करके प्रसन्न होकर उत्तम वरदान देती है।
भगवती कमलवासिनी को नमस्कार है। देवी नारायणी को बार-बार नमस्कार हैं संसार की सारभूता कृष्णप्रिया भगवती पद्या को अनेकशः नमस्कार है। पद्यासना, पद्यमिनी एवं वैष्णवी नाम से पसिद्ध भगवती महालक्ष्मी को बार-बार नमस्कार है । सर्वसम्पत्स्वरूपिणी मोक्षदायिनी और सिद्धिदायिनी देवी को बारम्बार नमस्कार है । भगवान् श्री हरि में भक्ति उत्पन्न करने वाली तथा हर्ष प्रदान करने में परम कुशल देवी को बार-बार नमस्कार है। भगवान श्रीकृष्ण के वक्षःस्थल पर विराजमान एवं उनकी हृदयेश्वरी देवी को बारबार प्रणाम है। रत्नपद्ये ! शोभने ! तुम श्रीकृष्ण की शोभास्वरूपा हो, सम्पूर्ण सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी एवं महादेवी हो।
तुम्हें मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ । शस्य की अधिष्ठात्रि देवी एवं शस्यस्वरूपा हो, तुम्हें मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ। शस्य की अधिष्ठात्रि देवी एवं शस्यस्वरूपा हो, तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। बुद्धिस्वरूपा एवं बुद्धिप्रदा भगवती के लिये अनेकशः प्रणाम है। देवि! तुम बैकुण्ठ में महालक्ष्मी, क्षीरसमुद्र में लक्ष्मी, राजाओं के भवन में राजलक्ष्मी, इन्द्र के स्वर्ग में स्वर्गलक्ष्मी, गृहस्थों के घर में गृहलक्ष्मी, प्रत्येक घर में गृहदेवता,गौमाता सुरभि और यज्ञ की पत्नी दक्षिणी के रूप में विराजमान रहती हो । तुम देवताओं की माता अदिति हो ।
कमलावासिनीकमलाभीतुम्हींहो । हव्यप्रदानकरनेकेसमय स्वाहाः'औरकव्य प्रदान करने के अवसर पर स्वधा'का जो उच्चारण होता है,वह तुम्हारा ही नाम हैं । सबको धारण करने वाली विष्णुस्वरूपा पृथ्वी तुम्ही हो । भगवान नारायण की उपासना में सदा तत्पर रहने वाली देवी ! तुम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हो ।
तु में क्रोध और हिंसा के लिए किञिचन्मात्र भी स्थान नहीं हैं तुम्हें वरदा, शारदा, शुभा, परमार्थदा एवं हरिदास्यप्रदा कहते हैं । तुम्हारे बिना सारा जगत भस्मीभूत एवं निःसार हैं जीते-जी ही मृतक है, शव केतुल्य है। तुम सम्पूर्ण प्राणियों की श्रेष्ठमाता हो । सबके बान्धवरूप में तुम्हारा ही पधारना हुआ है। तुम्हारे बिना भाई भी भाई-बन्धुओं के लिए बात करने योग्य भी नहीं रहता है । जो तुमसे हीन है, बन्धुजनों से हीन है। तथा जो तुमसे युक्त है, वह बन्धुजनों से भी युक्त है। तुम्हारी ही कृपा से धर्म,अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होते हैं। जिस प्रकार बचपन में दुध मुँहे बच्चों के लिये माता है, वैसे ही तुम अखिल जगत् की जननी होकर सबकी सभी अभिलाषाएँ पूर्ण किया करती है।
स्तनपायी बालक माता के न रहने पर भाग्यवश जी भी सकता है, परंतु तुम्हारे बिना कोई भी नहीं जी सकता । यह बिल्कुल निश्चित है। अम्बिके ! सदा प्रसन्न रहना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है। अतः मुझ पर प्रसन्न हो जाओ । सनातनी ! मेरा खाया हुआ राज्य तुम्हारी कृपा से वह मुझे पुनः प्राप्त हो जाय । हरिप्रिये ! मुझे जब तक तुम्हारा दर्शन नहीं मिला था, तभी तक मैं बन्धुहीन, भिक्षुक तथा सम्पूर्ण सम्पत्तियों से शून्य था ।
सुरेश्वरि ! मुझे राज्य दो,श्री दो, बल दो, कीर्ति दो,धन दो और यश भी प्रदान करो। हरिप्रिये ! मनोवान्छित वस्तुएँदो, बुद्धि दो, भोगदो, ज्ञान दो,धर्म दो तथा सम्पूर्ण अभिलाषित सौभाग्यदो । इसके अलावा मुझे प्रभाव, प्रतापसम्पूर्ण अधिकार, युद्ध में विजय, पराक्रम तथा परम ऐश्वर्य प्राप्ति भी कराओ । अब विष्णु भगवानकी निम्न प्रकार उपासना करें।

इस आवाह्न मन्त्र का उच्चरण करना चाहिये - ।
आमन्त्रितो महादेव सार्ध देव्या गणादिभिः ।।
मन्त्रैर्वा लोकपालैश्च सहितः परिचारकैः ।। ।
आगच्छ भगवन् विष्णों विधेः सम्पर्तिहेतवे । ।
प्रातस्त्वत्पूजनं कुर्मः सानिध्यं नियतं कुरु ।।।
'महान् देवता भगवान् विष्णु! मन्त्रों द्वारा आवाह्न करने पर आप देवी लक्ष्मी, पार्षद,लोकपाल और परिचारकों के साथ विधि की पूर्ति के लिये यहाँ पधारिये । प्रातः काल में मैं आपकी पूजा करता हूँ । यहाँ निश्चित रूप से सन्निकटतास्थापित कीजिये।'


विष्णु भगवान का इस प्रकार से पूजन करें।
श्री लक्ष्मीपति विष्णु भगवान (लक्ष्मी नारायण) जी की प्रार्थना
वन्दौं विष्णु विश्वाधार ।
लोकपति, सुरपति, रमापति, सुभग शान्ताकार ।
कमल-लोचन, कलुषहर, कलयाण-पद-दातार ।।
नील-नीरद-वर्ण, नीरज-नाभ, नभ-मनुहार ।
भृगुलता-कौस्तुभ-सुशोभित हृदय मुक्ताहार ।।
शंख-चक्र-गदा-कमलयुत भुज विभूषित चार ।
पीत-पट-परिधान पावन अंग-अंग उदार ।।
शेष-शया-शयित, योगी-ध्यान-गम्य, अपार ।
दुःखमय भव-भय-हरण, अशरणशरण अविकार ।।
इसके साथ श्रीवत्सधारी भगवान् श्री विष्णु से हाथ जोड़कर इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये -
श्रीवत्सधारिछीकान्त श्रीवत्स श्रीपतेऽव्यय ।
गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामदम् ।।
गावश्च मा प्रणश्यन्तु मा प्रणश्यन्तु मे जनाः ।
जामयो मा प्रणश्यन्तु मत्तो दाम्पत्यभेदतः ।।
लक्ष्या वियुज्येऽहं देव न कदाचिद्यथा भवान् ।
तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे वियुज्यताम् ।।
लक्ष्मया न शून्यं वरद यथा ते शयनं सदा ।
शय्या ममाप्यशूल्यास्तु तथा तु मधुसूदन ।।
हेश्रीवत्स-चिन्हको धारण करने वाले लक्ष्मी के स्वामीशाश्वत् भगवान् विष्णु! धर्म, अर्थ और काम को पूर्ण करने वाला मेरा गृहस्थ आजम कभी नष्ट न हो । मेरी गायें भी नष्ट ना हों,ना कभी मेरे परिवार के लोग कष्ट में पड़े एवमन नष्ट हो । मेरे घर की स्त्रियों भी कभी विपत्तियों में न पड़े और हम पति-पत्नी में कभी मतभेद उत्पन्न ना हो । हे देव! मैं लक्ष्मी से कभी वियुक्त न होऊँ और पत्नी से कभी मुझे वियोग की प्राप्ति ना हो। प्रभो! जैसे आपकी शय्या कभी लक्ष्मी से शून्य नहीं होती, उसी प्रकार मेरी शय्या भी कभीशोभारहित एवं लक्ष्मी तथा पत्नीसे शून्य ना हो।
भगवान विष्णु का ध्यान -
उदीयमान करोड़ो सूर्य के समान प्रभातफलय, अपने चारों हाथों में शंख,गदा, पद्य तथा चक्र धारण किये हुए एवंदोनों भोगों में भगवतीलक्ष्मी और पृथ्वी देवी से सुशोभित, किरीट, मुकुट, मयूर-हार और कुण्डलों से समलंकृत, कौस्तुभमणि तथा पीताम्बर से देदीप्यमान विग्रह युक्त एवं वक्षःस्थल पर श्रीवत्यचिन्ह धारण किये हुए भगवान विष्णु का मैं निरन्तर स्मरण-ध्यान करता हूँ।
संसार के भयरूपी महान् दुःख को नष्ट करने वाल, मगरमच्छ से गजराज को मुक्त करने वाले, चक्रधारी एवं नवीन कमलदल के समान नेत्र वाले, पद्यनाभ गरुड़वाहन भगवान् श्रीनारायण का मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ।
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णे शुभांगम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयन योगिर्भिध्यागभ्यं ।
वन्दविष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ।।
शान्त आकृति वाले, शेषनाग पर शयन करने वाले कमल के नाभि वाले देवतोओ के ईश्वर विश्व के आधार बादलों के रंग जैसे सुन्दर अंगों वाले लक्ष्मी के स्वामी कमलजैसीआँखों वाले जोयोगियों द्वाराध्यान करनेयोग्य,मैं उपरोक्त गुणवाले विष्णु भगवानकीजो संसार के भय,दुःखों को हरण करने वाले तथा समस्त संसार के एकमात्र स्वामी हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव ।
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव ।
त्वमेव सर्व मम देव देव ।।
देवदेवेश्वर!आपको नमस्कार है। देवता और दानवदोनों ही आपकी वन्दना करते हैं । पुण्डरीकाक्ष!आपदैत्यों के शत्रु हैं । मधुसूदन !इम लोगों की रक्षा कीजिये । जगन्नाथ! हे भक्तवत्सल ! सम्पूर्ण देवता सुर भक्तवत्सल! आपकीशरण में आये हैं,हमें बचाइये । देवदेवश्वर!हमें बचाइये । जनार्दन !हमारी रक्षा कीजिये । प्रभो! हम सब लोग आपके समीप आये हैं । आपकी ही शरण में आ पड़े हैं। भगवन्! शरण में आये हुए देवताओं की सहायता कीजिये । दे देव! आप ही पति, आप ही मति, आप ही कर्ता और आप ही कारण हैं। आप ही सब लोगों की माता और आप ही इस जगत् के पिता हैं ।
भगवान्! देवदेवेश्वर ! शरणागतवत्सल! देवता भयभीत होकर आपकी शरण में आये हैं । हम आपको बारम्बार नमस्कार करते है।
नमो मत्स्याय देवाय कूर्मदेवाय वै नमः ।
नमो वाराहदेवाय नरसिंहाय वै नमः ।।
वामनाय नमस्तुभ्यं परशुरामाय ते नमः ।
नमाऽस्तु रामदेवाय विष्णुदेवाय ते नमः ।
नमः सर्वात्मने तुभ्यं शिरसेत्यभिपूजयेत् ।।
'मत्स्य, कच्छप, वाराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्की-ये दस अवतार धारण करने वाले आप सर्वात्मा को मैं मस्तक झुकाकर नमस्कार करता हूँ।'
श्री वासुदेव का तत्व जानने के लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं,वे देव विष्णु हमारी बुद्धिको प्रेरितकरें।
'ॐ वासुदेवाय विद्यहे, महाहंसाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।।
हम श्रीवासुदेव का तत्व समझने के लिये ज्ञान प्राप्त करते हैं, महाहंसस्वरूप नारायण के लिये ध्यान करते हैं,श्री विष्णु हमें प्रेरित करें हमारी मन, बुद्धि को प्रेरणा देकर इस कार्य में लगायें ।।
'ॐ नमो नारायणाय पुरुषाय महात्मने, विशुद्धसत्वाय महाहंसाय धीमहि, तन्नो देवः प्रचोदयात् ।।
ॐ काररूप सर्वान्तर्यामी महात्मा नारायण को नमस्कार है, विशुद्ध सत्त्वमयमहाहंसस्वरूपश्रीविष्णु का हम ध्यान करते हैं,अत: श्रीविष्णु देवता हमें सत्कार्य में प्रेरित करें ।। क्लीं कृष्णाय विद्यहे, ह्रीं रामाय धीमहि, तन्नो देवः प्रचोयदयात् ।।
'क्लीं' रूप श्रीकृष्णतत्व को समझने के लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, 'ह्रीं' रूपाश्रीराम का हमध्यानकरते हैं,वेदेव श्रीरघुनाथजीहमें प्रेरित करें ।।
शं नृसिंहाय विद्यहे, श्रीकण्ठाय धीमहि, तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।।
शम्-कल्याणमय भगवान् नृसिंह का तत्व जानने के लिये हम ज्ञान प्राप्त करते हैं, श्रीकृष्ण का ध्यान करते हैं, वे श्रीनृसिंहरूप भगवान् विष्णु हमें प्रेरित करें।।
ॐ वासुदेवाय विद्यहे, देवकीसुताय धीमहि, तन्नोः कृष्णः प्रचोदयात् ।।
ॐ ह्रां ह्रीं हूं हैं ह्रौं ह्नः क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय नमः स्वाहा ।।
ॐ ह्रां ह्रीं हूं हूँ ह्रौं हः क्लीं- सच्चिदानन्दस्वरूप, गोपीजनों के प्रियतम भगवान् गोविन्द को नमस्कार है,
हम उनकी तृप्ति के लिये उत्तमरीतिसे हवन करते हैं-अपना सब कुछ अर्पण करते हैं।।
-: मन्त्र :
ॐ विष्णवे नमः । ॐ केशवाय नमः । ॐ जनार्दनाय नमः । ॐ अच्युताय नमः । ॐ लक्ष्मीपतये नमः । ॐ श्री हरये नमः । ॐ नमो नारायणाय ।
इस प्रकार विष्णु की पूजा करने के बाद फिर अश्विनी कुमारों की पूजा करनीचाहिए।
अश्विनी कुमारों का आवाह्न एवं पूजा -
1. हेअश्विनी कुमारों सूर्य और चन्द्रमाके समान आप प्रकाशित हो। तुम्हारी प्रशंसा बड़ी मीठी है । ईश्वर से सम्पर्क करने वाले योग्य रूपी यज्ञ को सिद्ध करो।
2. हेअश्विनी कुमारों आपदेवताओं के वैद्य हो । आप बड़े कोमल अंग वाले श्रेष्ठ वैद्य हो। हे अश्विनी देवों ! आप पुष्टि बढ़ाने वाले हो । मैं आपको नमस्कार करताहूँ।
3. हे अश्विनी कुमारों यहां आओ, यहाँ पर बैठा, आपको नमस्कार हैं । मैं आपका वावाह्न करता हूँ।
द्वाभयांअश्विनकुमाराभ्याम नमः ।

इस प्रकार अश्विन कुमार प्रसन्न होते हैं । व्रती को उत्तम रूप एवं समस्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। रात्री में जब चन्द्रमा निकलता है, उस समय निम्न मन्त्र को पढ़ते हुए चन्द्रमा को अर्घ्य देना चाहिये
गगनाड्.गणसम्भूत दुग्धाब्धिमथ्नोदव ।
भाभासितदिगाभोग रमानुज नमोऽसतु ते ।।
हे चन्द्रदेव आप आकाश में स्थित हो और दूध के समुद्र से आप का जन्म हुआ है। आप सुन्दर शोभासे युक्त हैं,आपलक्ष्मी के छोटे भाई हैं । आपको मेरा नमस्कार है।
अन्त में लक्ष्मीनिवास भगवान् श्रीकृष्ण को कर्म समर्पित करें
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं तु केशव । यत्पूजितं मया सम्यक् सम्पूर्ण यातु मे धुवम् ।।
'हेकेशव! मैंने मन्त्र, क्रिया और भक्ति के बिनाजो पूजन किया हो, वह भी निश्चयही परिपूर्ण होजाय।' जो फल भगवान को प्रिय है, उन्हें भगवान की शय्या पर समर्पित करना चाहिये और स्वयं भी रात्रि के समय उन्हीं फलों को खाकर दूसरे दिन ब्राह्मणों कोदक्षिणादेनीचाहिये।
राजाशतानीक ने पूछा-महामुने! भगवान् विष्णुको कौन-से फल प्रिय हैं, आपउन्हें बतायें । दूसरे दिनब्राह्मणों को क्यादानदेनाचाहिये ? उसे भकहें।
सुमन्तु मुनिबोले-राजन्! उस ऋतु में जो भी फल हों और पके हों, उन्हीं को भगवान् विष्णु के लिये समर्पित करना चाहिये । कडुवे-कच्चे तथा खट्टे फल उनकी सेवा में नहीं चढ़ाने चाहिये । भगवान् विष्णु को खजूर, नारिकेल,मातुलुंगअर्थात् बिजौराआदिमधुर फलों को समर्पित करना चाहिये । भगवान् मधुर फलों से प्रसन्न होते हैं । दूसरे दिन ब्राह्मणों को भी इसी प्रकार के मधुर फल,वस्त्र,अन्नतथासुवर्णकादानदेनाचाहिये।
इस प्रकार जो पुरुष चार मास तक व्रत करता है, उसका तीन जन्मों तक गृहस्थजीवन नष्ट नहीं होताऔर नतो ऐश्वर्य की कमी होती है। जो स्त्री इस व्रत को करती है
वहतीनजन्मों तकन विधवा होती हैन दुर्भगाऔर नपतिसे पृथक हीरहती है।
3. भगवान् श्रीकृष्ण बोले-राजन्! कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को यमुना ने अपने घर अपने भाई यम को भोजन करायाऔर यमलोक में बड़ा उत्सव हुआ,इसलिये इस तिथिका नाम यमद्वितीयाहै। अतः इस दिन भाई को अपने घर भोजन न कर बहिन के घर जाकर प्रेम पूर्वक उसके हाथ का बना हुआ भोजन करना चाहिये । उससे बल और पुष्टि की वृद्धि होती है। इसके बदले बहिन को स्वर्णालंकार, वस्त्र तथा द्रव्य आदि से संतुष्ट करना चाहिये । यदि अपनी सगी बहिन न हो तो पिता के भाई की कन्या, मामा की पुत्री, मौसी अथवा बुआ की बेटी-ये भी बहिन के समान हैं,इनके हाथ का बना भोजन करें । जो पुरुष यमद्वितीया को बहिन के हाथ का भोजन करता है, उसे धन, यश, आयुष्य,धर्म,अर्थऔरअपरिमितसुखकी प्राप्तिहोती है।
4.राजा युधिष्ठिर ने पूछा-भगवन्!आपने बताया कि सबधर्मो कासाधन गृहस्थाश्रम है, वहगृहस्थाश्रमस्त्री और पुरुष से ही प्रतिष्ठित होता है । पत्नीहीन पुरुष और पुरुषहीन नारी धर्म आदि साधन सम्पन्न करने में समर्थ नहीं हाते, इसलिये आपकोई ऐसाब्रत बतायें जिससे दाम्पत्यकावियोगनहो । __ भगवान् श्रीकृष्ण बोले-महाराज! श्रावणमास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया को अशून्यशयन नामक व्रत होता हैं इसके करने से स्त्री विधवा नहीं होती और पुरुष पत्नी से हीन नहीं होता। इस तिथिको लक्ष्मी सहित भगवान् विष्णु का शय्या पर अनेक उपयारों द्वारा पूजन करना चाहिये । इस दिन उपवास, नक्तव्रत अथवा अयाचित-व्रत करना चाहिये । व्रत के दिन इही, अक्षत, कन्द-मूल, फल, पुष्प, जल आदि स्वर्ण के पात्र में रखकर भगवान विष्णु कोअर्पित करना चाहिये । इस विधान के साथ जो व्यक्ति चार मास तक व्रत करता है, उसको कभी भी स्त्री-वियोग प्राप्त नहीं होता एवं उसे सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं । जो स्त्री भक्तिपूर्वक इस व्रत को करती है, वह तीनजन्मतक विधवा और दुर्भगा नहीं हेती । यह अशून्य-द्वितीया का व्रत सभी कामनाओं और उत्तम भोगों को देने वाला है,अतः इसे अवश्य करना चाहिये।
5.श्री द्वितीया व्रत (दौज का विधान)- पूर्वकाल में राजा चमत्कार बहुत दानवीर राजा था। उसने अपने राज्य की कुछ भूमिको विद्वानों को दान कर दिया, तब से इस स्थान का नाम चमत्कारपुर पड़ा । प्राचीन काल में राजा विदुरथ नाम से प्रसिद्ध एक हैहयवंशी (हैहयवंशी राजा यादव कहलाये) राजा हुए जो बड़े-बड़े यज्ञ एवंदानपति तथा प्रत्येक कार्य में दक्ष थे विदुरथ राजा ने अपने तप के बल से इस क्षेत्र में रहने वाली आत्माओं का, जो कर्मजनित दोषसे दुःखपारही थी,उनकाउद्धार किया। उन्होंने विदुरथशहर बसाया जोचमत्कारपुर के नजदीक था । इस सिद्ध स्थान पर मुनियों के आश्रम हुआ करते थे। इसी चमत्कारपुर में पूर्वकाल में संत रामकृष्ण नामक एक बहुत बड़े मुनि थे । उनको खड़े होकर तपस्या करते कई वर्ष बीत गये । उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् ने कहा कि मैं यहाँ प्रकट हुआ हूँ। यह कृष्णतीर्थ के नाम से जाना जायेगा । जो मनुष्य कृष्णतीर्थ में स्नान करता है उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं । दैत्यराज वाष्पकलि ने इन्द्र पर आक्रमण करके इन्द्र पर विजय पाई । इन्द्र ने स्वर्ग का सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ भगवान विष्णु की शरण ली । जहाँ शेषनाग की शैय्या पर श्री हरि योगनिद्रा को स्वीकार करके शयन करते हैं और देवी लक्ष्मी उनके चरणों की सेवा में संलग्न रहती है। वहाँ पहुँकर देवताओं ने भगवान् विष्णु की स्तुति की । श्री हरि शैय्या से उठकर इन्द्र से बोले तीनों लोकों में कुशल तो है? तुम सम्पूर्ण देवताओं को साथ लेकर यहाँ कैसे आये हो? इन्द्र ने विष्णु भगवन से कहा कि दैत्यराज वाष्पकलि भगवान शंकर से वरदान पाकर बड़ा बलवान हो गया है। वह देवताओं द्वारा अजेय है उसने युद्ध भूमि में मुझे परास्त कर दिया है। मधुसुदन ! वह इस समय स्वर्ग लोग में निवास करता है। इस तरह मैं सम्पूर्ण देवताओं के साथ आपकी शरण में आया हूँ। श्री भगवान बोले-हे इन्द्र! तुम कहीं सिद्ध तीर्थ में रहकर बड़ी भारी तपस्या करो । इस समय चमत्कारपुर का तेज सिद्धिदायक है तुम वहीं जाकर तपस्या करो । समय आने पर उसदानव को दंड दूंगा।
इन्द्र ने कहा-केशव! हम दानव राज वाष्पकलि से डरे हुए है अत: आपके बिना वहाँ नहीं जायेंगे, इसलिए आप स्वयं भी वहाँ चलियें,आपसे सुरक्षित होकर मैं वहाँ भारी तपस्या कर सकूँ। । भगवान विष्णु ने एवमस्तु कहकर देवताओं और लक्ष्मी के साथ चमत्कारपुर में पदार्पण किया । उस समय सभी देवताओं ने अपने-अपने लिए पृथक-पृथक आश्रम बनाए । भवन विष्णु ने वहाँ के प्राचीन कुंड में क्षीरसागर का आह्वाहन किया और श्वेद्वीपकी भाँति वहाँ निवास करने लगे । उस समय सभी देवता उनके चारों ओर विनीत भाव से खड़े होकर उनकी स्तुति करने लगे ।
तदनन्तर पूर्णिमा मास की गणना के अनुसार श्रावण मास कृष्ण पक्ष द्वितीया (दौज तिथि) काशुभ दिवस आने पर बृहस्पति जी ने इन्द्र से कहा-कि यहद्वितीया(दौज) भगवान विष्णु की सर्वप्रिय तिथि है। ___ यह सुनकर देवराज इन्द्र ने शास्त्रोक्त् विधि से दौज (द्वितीया) का व्रत करके जलशायी विष्णु का पूजन किया । और इस प्रकार चार महीने तक दौज (द्वितीया) के दिन वे श्री हरि का पूजन करते रहे इस दौज के व्रत के कारण इन्द्रदेव दिव्य तेजसे सम्पन्न हो गये । तब तेजस्वरूपइन्द्र को देखकर भगवान विष्णु बड़े प्रसन्न हुए और बोले-इन्द्र अब तुम देवताओं के साथ मिलकर वाष्पकलि का वध करने जाओ । तुम्हारी विजय होगी ।भगवान विष्णु के दिये हुए आशीर्वाद एवं दौज व्रत के प्रताप से देवराज इन्द्र ने वाष्पकलि का सम्पूर्ण दानवों सहित संहार कर डाला और स्वर्ग का सिंहासन प्राप्त किया।
इन्द्र ने भगवान विष्णु से कहा हे प्रभु! मेरे लिए तथा सम्पूर्ण लोकों का हित करने के लिए उपदेश दीजिए । तब विष्णु भवानने कहा-हे इन्द्रइस कुंड में मैं सदैव निवास करूँगा और इन पवित्र जल में जो व्यक्ति स्नान करेगा उसके सब संकट दूर होंगे । जो व्यक्ति दौज (द्वितीया) का व्रत करके भक्तिपूर्वक यहाँ आकर मेरी पूजा करेगा वह मनुष्य मनोवांछित कामनाओं को प्राप्त कर लेगा । जिन माता-बहनों की गोद पुत्र रल से वंचित है उनको पुत्ररत्न की प्राप्ति होगी। तथा कोई माता-पुत्र के बगैर और बहन-भाई के बगैर नहीं रहेगी । निर्धन को धन की प्राप्ति होगी । असाध्य रोगों से मुक्ति मिलेगी । अंधे को नेत्र ज्योति प्रदान होगी । (स्कन्द एकंदपुराण नगरखंड-पूर्वाद्ध)
गुरूगोरखनाथजी की सवारी काआना द्वितीया के दिनशुरू गोरखनाथ नरे राजाधर्मदेवको गुरूदीक्षादी थी तथा इस दिन बहुत पर्व मनाया गया । इस उत्सव में सभी देवता पधारे थे। सभी को भोग दिया गया । जो नहीं आया, उसका भोग उसके घर भे दिया गया । इस द्वितीयाके व्रत को इसलिए धर्मबीज कहते हैं। गुरू गोरखनाथ जी ने आशीर्वाद दिया कि जो नर नारी इस व्रत को करेंगें । उसके घर में पुत्र-पौत्र,समस्त ऐश्वर्य,दीर्घायु से परिपूर्ण होंगें।
कलयुग में 88,000 ऋषियों ने गंगा के किनारे एकत्र होकर सृष्टि कल्याण के लिए इस द्वितीया दौज, की कथा को कहा है। सतयुग में यह कथा विष्णु भगवान से,त्रेता में श्री राम के नाम से,द्वापर में श्री कृष्ण भगवान के नामसे एवं कलयुग में (द्वापर कामोन,त्रेता काराम) मोहन राम के नाम से यह कथा कही जाती है। जो व्यक्ति अपने घर में नियम एवं सयम से व्रत करके खीर का भोगलगाकर इस व्रत को करेगा उसके घर में लक्ष्मी का वास होगाव उसके सभी मनोरथ पूर्ण होंगे । उसके घर में कलि का वास नहीं होगा । जो व्यक्ति बाबा मोहन राम की दौज का जागरण करायेगा उस घर का दुखः दरिद्र दूर हो जायेगा तथा बाबा मोहनराम का वास हो जायेगा।

Goto Home Page

Voluntary Contribution

Support Vedic Astrology | Please Contribute